ये कौन मसीहा निकसा है….

ये कौन मसीहा निकसा है….:
anhasketch
एक कोशिश करता रहता हूँ
मैं बस.. मैं.. नहीं
कुछ और हो जाऊँ
उलझन उलझन तैर रहा हूँ
जाने क्या से क्या हो जाऊँ
कभी सोचता धूप बनूँ मैं
या पेड़ों की छाया हो जाऊँ..
कभी लगा कि बनूँ आसमां
या फिर धरा हरी हो जाऊँ..
लू के मैं बनूँ गरम थपेड़े
या सौंधी सौंधी नमीं माटी की हो जाऊँ...
नदिया बन झर झर बहूँ
या पहाड़ एक बुलन्द हो जाऊँ
कहानी लिखूँ, कविता रचूँ
या तुकबंदी कर कवि हो जाऊँ...
सोचा कि कोयल हो जाऊँ
या कोयल की धुन में खो जाऊँ
सीना मानिंद फौलाद रखूँ
या मोम सरीखा दिल रख कर
पर पीड़ा पर रो आऊँ...
कुछ राज दफन कर लूँ दिल में
या बिगुल बजा आह्वान करुँ
या बदलूँ इन हालातों को
और नैतिकता का सम्मान करुँ
कि भीड़ अकेला बन जाऊँ..
अनशन कर अभिमान करुँ...
फिर तुम आना और कह देना
ये कौन मसीहा निकसा है
जब दमित करें आवाज मेरी
हो मौन-फकीरा फिरता है...
यूँ याद रखेगा जग मुझको
कि आने वाली नस्लों को
मैं याद बना भयभीत करुँ
समझौता करना जीवन है..
ऐसा कानों में गीत भरुँ...
फिर कौन मसीहा जागेगा..
षड़यंत्रों के इस जाले में..
घिर करके यूँ डर जाने को....
यूँ मौन धरे मर जाने को...
-समीर लाल ’समीर’


चित्र साभार: गुगल

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