बहुत से लोगों का मानना है कि अभिव्यक्ति की आजादी, वर्तमान शताब्दी की आवश्यकताओं में से है और जिस समाज में अभिव्यक्ति और संचार माध्यमों की स्वतंत्रता न हो वह तानाशाही समाज होता है। यह बात स्पष्ट है कि अभिव्यक्ति की आजादी का अर्थ, अपमान, उपहास और अराजकता नहीं है बल्कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ सदैव अपने तार्किक व यथार्थवाद व्यवहार से हटकर सामने आता है।
अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर सोशल मीडिया में अमर्यादित भाषा का प्रयोग चर्चा का विषय है। यह सर्वविदित है की अब आए दिन सोशल मीडिया में भद्दे वक्तव्य और कार्टून या व्यंगयात्मक चित्र के रूप मे ऐसे भद्दे-भद्दे दृश्य देखने को मिल रहे हैं, जो हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या वैचारिक-अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को इस तरह से व्यक्त करके हम अपनी लोकतांत्रिक स्वतंत्रता का गलत प्रयोग तो नहीं करने लगे हैं। हमें इस संदर्भ में नोम चोमस्की का यह कथन याद आ जाता है की अगर हम उन लोंगो की अभिव्यक्ति की आजादी पर विश्वास नहीं करते, जो हमें नापसंद हैं तो इसका सीधा मतलब है कि अभिव्यक्ति की आजादी पर हमारा विश्वास है ही नहीं।
विचार इस दुनिया में सबसे घातक हथियार हैं और यह किसी से नहीं छिपा है कि किस तरह से अच्छे विचार संसार को बदलते हैं, इसमें भी कोई दो राय नहीं है पर यह भी सत्य है कि कभी भी विचारों की अभिव्यक्ति नकारात्मक तरीके से करके बदलाव नहीं लाया जा सकता है। सोशल मीडिया पर हमें हर दिन लाखों ऐसी पोस्ट देखने को मिल जाती हैं, जिसमें भद्रता को भी बड़े ही आपत्तिजनक तरीके से पेश किया जाता है। क्यों न इसे नियंत्रित किया जाए, यह सवाल दिन-प्रतिदिन अहम बनता जा रहा है, यह ठीक है कि हमारे लोकतंत्र में सबको अपनी बात रखने का पूरा अधिकार है पर बात को सबसे सभ्य तरीके से रखने का गुण होना लाजिमी है। यकीनन प्रत्येक व्यक्ति के लिए उसके विचार ही सारे तालों की चाबी हैं पर विचारो को व्यक्त करने का एक सभ्य तरीका ही उसकी लोकतांत्रिक अभिवयक्ति को आधार प्रदान करेगा।
अब अगर हम उसे अश्लील या ऊटपटांग ढंग से व्यक्त करने को सही मानने लगेंगे तो एक दिन ऐसा भी आ सकता है, जब हर बात पर गाली-गलौज ही बहस का एकमात्र तरीका रह जाए। अपने विचार को अगर हमें अभिव्यक्त करना है तो इसके लिए हमें भाषा का मापदंड सबसे ऊपर रखना होगा। सोशल मीडिया के दुरुपयोग से जुड़ा दूसरा बिंदु भी इसी से जुड़ा है। सोशल मीडिया के चाहे जितने लाभ हों, उनसे आतंकवादियों के हाथ और भी लंबे हो रहे हैं। इस बात को लेकर चिंताए बढ़ती जा रही हैं कि गैर सामाजिक व देशद्रोही तत्त्वों को अपनी विचारधारा को प्रचारित करने और अपनी कुत्सित योजनाओं को साकार करने का सोशल मीडिया एक सहज व सस्ता माध्यम है। सोशल नेटवर्क माध्यम अपनी बात अपने जैसों तक पहुंचाने, लोगों को गुमराह करने, भड़काने या उनसे संपर्क साधने के लिए आतंकवादियों की पहली पसंद बन गए हैं।
अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर सोशल मीडिया में अमर्यादित भाषा का प्रयोग चर्चा का विषय है। यह सर्वविदित है की अब आए दिन सोशल मीडिया में भद्दे वक्तव्य और कार्टून या व्यंगयात्मक चित्र के रूप मे ऐसे भद्दे-भद्दे दृश्य देखने को मिल रहे हैं, जो हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या वैचारिक-अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को इस तरह से व्यक्त करके हम अपनी लोकतांत्रिक स्वतंत्रता का गलत प्रयोग तो नहीं करने लगे हैं। हमें इस संदर्भ में नोम चोमस्की का यह कथन याद आ जाता है की अगर हम उन लोंगो की अभिव्यक्ति की आजादी पर विश्वास नहीं करते, जो हमें नापसंद हैं तो इसका सीधा मतलब है कि अभिव्यक्ति की आजादी पर हमारा विश्वास है ही नहीं।
विचार इस दुनिया में सबसे घातक हथियार हैं और यह किसी से नहीं छिपा है कि किस तरह से अच्छे विचार संसार को बदलते हैं, इसमें भी कोई दो राय नहीं है पर यह भी सत्य है कि कभी भी विचारों की अभिव्यक्ति नकारात्मक तरीके से करके बदलाव नहीं लाया जा सकता है। सोशल मीडिया पर हमें हर दिन लाखों ऐसी पोस्ट देखने को मिल जाती हैं, जिसमें भद्रता को भी बड़े ही आपत्तिजनक तरीके से पेश किया जाता है। क्यों न इसे नियंत्रित किया जाए, यह सवाल दिन-प्रतिदिन अहम बनता जा रहा है, यह ठीक है कि हमारे लोकतंत्र में सबको अपनी बात रखने का पूरा अधिकार है पर बात को सबसे सभ्य तरीके से रखने का गुण होना लाजिमी है। यकीनन प्रत्येक व्यक्ति के लिए उसके विचार ही सारे तालों की चाबी हैं पर विचारो को व्यक्त करने का एक सभ्य तरीका ही उसकी लोकतांत्रिक अभिवयक्ति को आधार प्रदान करेगा।
अब अगर हम उसे अश्लील या ऊटपटांग ढंग से व्यक्त करने को सही मानने लगेंगे तो एक दिन ऐसा भी आ सकता है, जब हर बात पर गाली-गलौज ही बहस का एकमात्र तरीका रह जाए। अपने विचार को अगर हमें अभिव्यक्त करना है तो इसके लिए हमें भाषा का मापदंड सबसे ऊपर रखना होगा। सोशल मीडिया के दुरुपयोग से जुड़ा दूसरा बिंदु भी इसी से जुड़ा है। सोशल मीडिया के चाहे जितने लाभ हों, उनसे आतंकवादियों के हाथ और भी लंबे हो रहे हैं। इस बात को लेकर चिंताए बढ़ती जा रही हैं कि गैर सामाजिक व देशद्रोही तत्त्वों को अपनी विचारधारा को प्रचारित करने और अपनी कुत्सित योजनाओं को साकार करने का सोशल मीडिया एक सहज व सस्ता माध्यम है। सोशल नेटवर्क माध्यम अपनी बात अपने जैसों तक पहुंचाने, लोगों को गुमराह करने, भड़काने या उनसे संपर्क साधने के लिए आतंकवादियों की पहली पसंद बन गए हैं।

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