तलाश खुद की






कितना अच्छा लगता है
कभी खुद से खोकर
खुद को ढूँढना.

बीती हुई गलतियों पर
एक निर्पेक्ष दृष्टिपात;
गुजरे रास्तों से
फिर से गुजरना,
छोड़े हुए मोडों पर
जगती जिज्ञासा,
कहाँ ले जाते 
वे मोड़
अगर लिये होते.

खुशियों के कुछ मधुर पल 
जो आज भी अंकित हैं
स्मृतियों में,
और वे पल भी
जब कभी रोये थे 
बिना किसी कंधे के सहारे.

कितने साथी और रिश्ते
जो बने और बिछुड़ गये
और कुछ 
जो होकर भी साथ
बन गये अनजाने.

इतिहास के 
पीले पन्नों में
कुछ सूखे गुलाब,
आँखों से गिरे
अश्कों के कुछ फ़ीके धब्बे,
और उनके बीच झांकता 
एक धुंधला चेहरा,
कितना मुश्किल कर देता है
उन पन्नों में ढूँढना 
अपने आप को.

काश भूल पाता यह सब
और ढूंढ पाता
खुद को खुद से भूल कर 
वह मासूम 
और निश्छल चेहरा 
जो फंस गया है
जीवन के मकड़जाल में.