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| इंटरनेट से साभार |
जिंदगी
जिंदगी यों ही संघर्षों में निकल गई,
वक्त, मुठ्ठी में रेत की तरह फिसल गई,
जो भी चाहा परिश्रम से मिला यारों,
सफलता ही मेरी वजूद की दुश्मन बन गई।
मैंने अपने-आप को खोकर पाया सब कुछ,
अब रिश्तेदारी के नाम पर, बचा न अब कुछ,
जो मेरे रुतबे को सलाम करते थे यारों,
सम्मान के नाम पर, उन्हीं का सामान बचा है अब कुछ।
सुख-दुःख में किसी के काम न आया,
समय चक्र को समझ न पाया,
अहंकार में जी रहा था यारों,
अपना था जो वो हो गया पराया।
अब मैं आशक्त पड़ा हुआ हूँ,
दुःख-चिंता से घिरा हुआ हूँ,
अब किसको आवाज़ दूँ यारों,
अपनी नज़र में शर्मिंदा हुआ हूँ।
मिल-जुल कर हम रहना सीखें,
सब की इज्जत करना सीखें,
जिंदगी अकेले जीने का नाम नहीं है यारों,
सब को साथ लेकर जीना सीखें।
-राकेश कुमार श्रीवास्तव
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