प्राथमिक कक्षाओं में शिक्षा किस भाषा माध्यम से दी जाए, इस पर लंबे समय से बहस होती रही है। निश्चित रूप से कम उम्र के बच्चों के लिए मातृभाषा में शिक्षा सहज ग्राह्य होती है और इससे उनके भीतर सोचने-समझने और विश्लेषण करने की क्षमता का स्वाभाविक विकास होता है। लेकिन यह इस बात पर निर्भर है कि बच्चों का भाषाई विकास अपनी मातृभाषा के साथ ही हो रहा हो और वे उसमें पढ़ाई-लिखाई को लेकर दूसरी भाषाओं के मुकाबले ज्यादा सहज हों। अगर कोई बच्चा उर्दू या अंग्रेजी भाषा के बीच पल-बढ़ रहा हो तो उसके संदर्भ में भी यही बात लागू होती है। इस लिहाज से देखें तो तकरीबन दो दशक पहले कर्नाटक सरकार का कक्षा एक से चार तक के लिए शिक्षा माध्यम के तौर पर मातृभाषा या क्षेत्रीय भाषा, यानी कन्नड़ को अनिवार्य करने का फैसला अपने आप में विरोधाभासी था। अगर कर्नाटक सरकार की यह दलील मान भी ली जाए कि बच्चों के संपूर्ण बौद्धिक और सांस्कृतिक विकास के लिए मातृभाषा सीखनी जरूरी है, तो सवाल है कि इसकी सीमा केवल स्थानीय संस्कृति क्यों हो! बहरहाल, सरकारी स्कूलों में तो यह चलता रहा, लेकिन निजी स्कूलों ने इस पर आपत्ति जताई। इसी के बाद जुलाई 2008 में कर्नाटक हाईकोर्ट ने कहा था कि भाषा माध्यम की नीति निजी स्कूलों पर नहीं थोपी जा सकती। अब मंगलवार को सर्वोच्च न्यायालय ने भी यह व्यवस्था दे दी कि बच्चों को प्राथमिक शिक्षा किस भाषा में दी जाए, यह तय करने का हक केवल विद्यार्थी और अभिभावक को है। अदालत ने स्पष्ट कहा कि सरकार को भाषाई अल्पसंख्यकों को प्राथमिक शिक्षा के माध्यम के तौर पर अनिवार्य रूप से क्षेत्रीय भाषा लागू करने के लिए बाध्य करने का अधिकार नहीं है। हालांकि कायदे से सरकारी या निजी स्कूलों में शिक्षा पद्धति एक समान होनी चाहिए, क्योंकि इन अलग-अलग स्कूलों में पढ़ने वाले सभी बच्चे ही होते हैं, फर्क सिर्फ आर्थिक पहुंच का हो सकता है।
मातृभाषा में शुरुआती पढ़ाई-लिखाई निश्चित रूप से बच्चों के स्वाभाविक विकास में सहायक होती है, लेकिन
आज एक बड़ी हकीकत यह है कि बड़े पैमाने पर ऐसे परिवार हैं, जो कई वजहों से सरकारी तौर पर घोषित मातृभाषा से अलग किसी दूसरी भाषा के साथ जीते हैं। भाषाई अल्पसंख्यकों की स्थिति से इस पहलू को समझा जा सकता है। मसलन, संभव है कि शुरू से उर्दू भाषाभाषी परिवार में पैदा हुए किसी बच्चे के लिए इसी भाषा में शिक्षा ग्रहण करना ज्यादा सहज हो। इसी तरह बहुत सारे परिवारों के बच्चे शुरू से अंग्रेजी भाषा के बीच विकसित हो रहे हैं, इसलिए उनके अभिभावक उनकी शिक्षा का माध्यम भी वही चुनना चाहते हैं। इस पहलू पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अगर सरकार अनिच्छुक विद्यार्थियों पर मातृभाषा में पढ़ाई करने का दबाव डालती है, तो इससे उनकी उत्पादकता पर असर पड़ सकता है, वे अक्षम बन सकते हैं। अदालत के इस सवाल पर विचार किया जाना चाहिए कि अगर ऐसा होता है तो फिर हम दुनिया में कैसे टिके रहेंगे! हालांकि अनेक देशों के ऐसे उदाहरण हैं, जिन्होंने अपनी भाषा में सभी मोर्चों पर विकास किया और दुनिया के सबसे शक्तिशाली देशों के समकक्ष खड़े हैं। लेकिन यह देशकाल पर निर्भर है कि वहां किसी भाषा को सभी क्षेत्रों में बराबर महत्त्व देने और उपयोगी बनाने की दिशा में ठोस काम हुए हों। हमारे यहां इस मोर्चे पर अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है।