खामोशियां

कभी-कभी
भावनाओ को
शब्दों का साथ नही मिलता.
परिस्थितिया है ऐसी भी आती,
हम रहते है खामोश,
और खामोशियां है कह जाती।

और प्यार हो गया ....

कभी-कभी
​​

छोटी सी बातें
दिल को है छु जाती
पर एकबार ही होती है ऐसी हलचल दिल में
जो ताउम्र थम नही पाती

रिश्तो के बनने बिगड्ने के खेल से
एक रिश्ता ही उपर उठ पाता है
अनजाने चेहरो के भीड मे
एक चेहरा ज़िन्दगी बन जाता है..

हर कोई , कही हार जाता है !

मुस्कराते चेहरो के पिछे , छिपा दर्द किसे नजर आता है ?
सचमुच ..
हर कोई, कही न कही हार जा
​​
ता है !!

न जाने क्यो....

तुम बूरे थे...
आखिर कैसे ??
ये मुझे याद है..
तुम्हारी अच्छाईयो को मै भूल गया...

न जाने क्यो ...

न जाने क्यो
मुझे याद है तुम्हारे शरारते
तुम्हारी शराफ़त को मै भूल गया...​

प्रसारण का पक्ष

मीडिया के कामकाज पर सवाल पहले भी उठते रहे हैं, लेकिन इन चुनावों के दौरान टीवी चैनलों का जो खुला कारोबारी रूप सामने आया है, वह पत्रकारिता के मानदंडों का एक तरह से मखौल उड़ाता है। सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज के एक अध्ययन के मुताबिक एक मार्च से लेकर तीस अप्रैल के बीच टीवी के सबसे व्यस्त समय, यानी प्राइम टाइम के दौरान अकेले भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी को दो हजार पांच सौ पचहत्तर मिनट दिए गए, यानी कुल प्रसारण समय का लगभग एक तिहाई वक्त। इसके बाद आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल को लगभग साढ़े दस फीसद और कांग्रेस के नेता राहुल गांधी को महज 4.33 फीसद समय मिला। अंदाजा लगाया जा सकता है कि इतने बड़े लोकतंत्र के मौजूदा चुनावों में शामिल बाकी राजनीतिक दलों और नेताओं के लिए टीवी चैनलों के पास कितनी जगह थी। हालांकि अध्ययन के दायरे में पांच चैनल थे, लेकिन यह भी सच है कि आम जनता के बीच इन्हीं की सबसे ज्यादा पहुंच है। इन पर बाकी नेताओं के मुकाबले नरेंद्र मोदी को जिस पैमाने पर जगह दी गई या देने की होड़ देखी गई, वह अपने आप में मीडिया की जिम्मेदारी और उसके पत्रकारीय सरोकारों पर सवाल उठाता है। सवाल है कि मोदी का साक्षात्कार एक साथ कई टीवी चैनलों पर या फिर किसी टीवी चैनल पर एक ही साक्षात्कार के बार-बार प्रसारण की क्या तुक थी? किसी खास राजनीतिक दल या उसके नेता को लेकर मीडिया में जिस तरह की होड़ देखी गई, वैसी ही स्थितियों में कई बार ‘पेड न्यूज’ की आशंका जताई जाती है। आखिर किन वजहों से इन चुनावों के बारे में कहा जा रहा है कि यह लोकतंत्र का नहीं, मीडिया का महापर्व है, जिसमें मीडिया ‘मोदीमय’ हो गया है! दरअसल, पिछले कुछ समय से मीडिया पर कॉरपोरेट हाउसों के परोक्ष नियंत्रण को लेकर जैसी बातें चल रही थीं, टीवी चैनलों के इस रुख ने एक तरह से उसकी पुष्टि ही की है।

पिछले डेढ़-दो दशकों के दौरान इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के रूप में टीवी चैनलों का जिस पैमाने पर विस्तार हुआ है और आम लोगों के बीच उसकी पहुंच बढ़ती गई है, उसी गति से किसी मसले पर राय बनाने की प्रक्रिया में भी उसका दखल बढ़ा है। इस लिहाज से होना यह चाहिए था कि टीवी चैनलों के कार्यक्रमों, उस पर प्रसारित समाचारों और विश्लेषणों में विविधता और संतुलन दिखाई दे और उसकी प्रस्तुतियों में व्यापक जनसमूह की उचित भागीदारी दिखे। चूंकि मीडिया को लोकतंत्र के चौथे खंभे के तौर पर देखा जाता है, इसलिए भी यह अपेक्षा स्वाभाविक है। लेकिन हमारे देश में टीवी के समाचार चैनलों का सच शायद इस उम्मीद से काफी दूर है। किसी मुद्दे पर आम लोगों को सूचना या विचार देने के मामले में टीवी चैनलों और उन्हें नियंत्रित या संचालित करने वालों की भूमिका अहम होती है। विडंबना है कि जैसे-जैसे समाचार चैनलों का विस्तार होता जा रहा है, उनकी प्रस्तुतियों में विविधता को जरूरी जगह देने के बजाय उसका एक भ्रम खड़ा किया जा रहा है। ऐसी स्थिति में जिस जगह से वर्चस्व को तोड़ने की कोशिश होनी चाहिए थी, वहीं कमजोर तबकों की आवाज दब जाती है। समाचार चैनलों का इस तरह पक्षपातपूर्ण या कमाई के लोभ में बनता रुझान आखिरकार उनकी विश्वसनीयता को कमजोर बनाता है। ऐसे में मीडिया के भीतर से ही इस प्रवृत्ति को नियंत्रित करने की अपेक्षा स्वाभाविक ही एक बार फिर की जाने लगी है।

पढ़ाई की भाषा

प्राथमिक कक्षाओं में शिक्षा किस भाषा माध्यम से दी जाए, इस पर लंबे समय से बहस होती रही है। निश्चित रूप से कम उम्र के बच्चों के लिए मातृभाषा में शिक्षा सहज ग्राह्य होती है और इससे उनके भीतर सोचने-समझने और विश्लेषण करने की क्षमता का स्वाभाविक विकास होता है। लेकिन यह इस बात पर निर्भर है कि बच्चों का भाषाई विकास अपनी मातृभाषा के साथ ही हो रहा हो और वे उसमें पढ़ाई-लिखाई को लेकर दूसरी भाषाओं के मुकाबले ज्यादा सहज हों। अगर कोई बच्चा उर्दू या अंग्रेजी भाषा के बीच पल-बढ़ रहा हो तो उसके संदर्भ में भी यही बात लागू होती है। इस लिहाज से देखें तो तकरीबन दो दशक पहले कर्नाटक सरकार का कक्षा एक से चार तक के लिए शिक्षा माध्यम के तौर पर मातृभाषा या क्षेत्रीय भाषा, यानी कन्नड़ को अनिवार्य करने का फैसला अपने आप में विरोधाभासी था। अगर कर्नाटक सरकार की यह दलील मान भी ली जाए कि बच्चों के संपूर्ण बौद्धिक और सांस्कृतिक विकास के लिए मातृभाषा सीखनी जरूरी है, तो सवाल है कि इसकी सीमा केवल स्थानीय संस्कृति क्यों हो! बहरहाल, सरकारी स्कूलों में तो यह चलता रहा, लेकिन निजी स्कूलों ने इस पर आपत्ति जताई। इसी के बाद जुलाई 2008 में कर्नाटक हाईकोर्ट ने कहा था कि भाषा माध्यम की नीति निजी स्कूलों पर नहीं थोपी जा सकती। अब मंगलवार को सर्वोच्च न्यायालय ने भी यह व्यवस्था दे दी कि बच्चों को प्राथमिक शिक्षा किस भाषा में दी जाए, यह तय करने का हक केवल विद्यार्थी और अभिभावक को है। अदालत ने स्पष्ट कहा कि सरकार को भाषाई अल्पसंख्यकों को प्राथमिक शिक्षा के माध्यम के तौर पर अनिवार्य रूप से क्षेत्रीय भाषा लागू करने के लिए बाध्य करने का अधिकार नहीं है। हालांकि कायदे से सरकारी या निजी स्कूलों में शिक्षा पद्धति एक समान होनी चाहिए, क्योंकि इन अलग-अलग स्कूलों में पढ़ने वाले सभी बच्चे ही होते हैं, फर्क सिर्फ आर्थिक पहुंच का हो सकता है।
मातृभाषा में शुरुआती पढ़ाई-लिखाई निश्चित रूप से बच्चों के स्वाभाविक विकास में सहायक होती है, लेकिन
आज एक बड़ी हकीकत यह है कि बड़े पैमाने पर ऐसे परिवार हैं, जो कई वजहों से सरकारी तौर पर घोषित मातृभाषा से अलग किसी दूसरी भाषा के साथ जीते हैं। भाषाई अल्पसंख्यकों की स्थिति से इस पहलू को समझा जा सकता है। मसलन, संभव है कि शुरू से उर्दू भाषाभाषी परिवार में पैदा हुए किसी बच्चे के लिए इसी भाषा में शिक्षा ग्रहण करना ज्यादा सहज हो। इसी तरह बहुत सारे परिवारों के बच्चे शुरू से अंग्रेजी भाषा के बीच विकसित हो रहे हैं, इसलिए उनके अभिभावक उनकी शिक्षा का माध्यम भी वही चुनना चाहते हैं। इस पहलू पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अगर सरकार अनिच्छुक विद्यार्थियों पर मातृभाषा में पढ़ाई करने का दबाव डालती है, तो इससे उनकी उत्पादकता पर असर पड़ सकता है, वे अक्षम बन सकते हैं। अदालत के इस सवाल पर विचार किया जाना चाहिए कि अगर ऐसा होता है तो फिर हम दुनिया में कैसे टिके रहेंगे! हालांकि अनेक देशों के ऐसे उदाहरण हैं, जिन्होंने अपनी भाषा में सभी मोर्चों पर विकास किया और दुनिया के सबसे शक्तिशाली देशों के समकक्ष खड़े हैं। लेकिन यह देशकाल पर निर्भर है कि वहां किसी भाषा को सभी क्षेत्रों में बराबर महत्त्व देने और उपयोगी बनाने की दिशा में ठोस काम हुए हों। हमारे यहां इस मोर्चे पर अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है।