प्रसारण का पक्ष

मीडिया के कामकाज पर सवाल पहले भी उठते रहे हैं, लेकिन इन चुनावों के दौरान टीवी चैनलों का जो खुला कारोबारी रूप सामने आया है, वह पत्रकारिता के मानदंडों का एक तरह से मखौल उड़ाता है। सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज के एक अध्ययन के मुताबिक एक मार्च से लेकर तीस अप्रैल के बीच टीवी के सबसे व्यस्त समय, यानी प्राइम टाइम के दौरान अकेले भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी को दो हजार पांच सौ पचहत्तर मिनट दिए गए, यानी कुल प्रसारण समय का लगभग एक तिहाई वक्त। इसके बाद आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल को लगभग साढ़े दस फीसद और कांग्रेस के नेता राहुल गांधी को महज 4.33 फीसद समय मिला। अंदाजा लगाया जा सकता है कि इतने बड़े लोकतंत्र के मौजूदा चुनावों में शामिल बाकी राजनीतिक दलों और नेताओं के लिए टीवी चैनलों के पास कितनी जगह थी। हालांकि अध्ययन के दायरे में पांच चैनल थे, लेकिन यह भी सच है कि आम जनता के बीच इन्हीं की सबसे ज्यादा पहुंच है। इन पर बाकी नेताओं के मुकाबले नरेंद्र मोदी को जिस पैमाने पर जगह दी गई या देने की होड़ देखी गई, वह अपने आप में मीडिया की जिम्मेदारी और उसके पत्रकारीय सरोकारों पर सवाल उठाता है। सवाल है कि मोदी का साक्षात्कार एक साथ कई टीवी चैनलों पर या फिर किसी टीवी चैनल पर एक ही साक्षात्कार के बार-बार प्रसारण की क्या तुक थी? किसी खास राजनीतिक दल या उसके नेता को लेकर मीडिया में जिस तरह की होड़ देखी गई, वैसी ही स्थितियों में कई बार ‘पेड न्यूज’ की आशंका जताई जाती है। आखिर किन वजहों से इन चुनावों के बारे में कहा जा रहा है कि यह लोकतंत्र का नहीं, मीडिया का महापर्व है, जिसमें मीडिया ‘मोदीमय’ हो गया है! दरअसल, पिछले कुछ समय से मीडिया पर कॉरपोरेट हाउसों के परोक्ष नियंत्रण को लेकर जैसी बातें चल रही थीं, टीवी चैनलों के इस रुख ने एक तरह से उसकी पुष्टि ही की है।

पिछले डेढ़-दो दशकों के दौरान इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के रूप में टीवी चैनलों का जिस पैमाने पर विस्तार हुआ है और आम लोगों के बीच उसकी पहुंच बढ़ती गई है, उसी गति से किसी मसले पर राय बनाने की प्रक्रिया में भी उसका दखल बढ़ा है। इस लिहाज से होना यह चाहिए था कि टीवी चैनलों के कार्यक्रमों, उस पर प्रसारित समाचारों और विश्लेषणों में विविधता और संतुलन दिखाई दे और उसकी प्रस्तुतियों में व्यापक जनसमूह की उचित भागीदारी दिखे। चूंकि मीडिया को लोकतंत्र के चौथे खंभे के तौर पर देखा जाता है, इसलिए भी यह अपेक्षा स्वाभाविक है। लेकिन हमारे देश में टीवी के समाचार चैनलों का सच शायद इस उम्मीद से काफी दूर है। किसी मुद्दे पर आम लोगों को सूचना या विचार देने के मामले में टीवी चैनलों और उन्हें नियंत्रित या संचालित करने वालों की भूमिका अहम होती है। विडंबना है कि जैसे-जैसे समाचार चैनलों का विस्तार होता जा रहा है, उनकी प्रस्तुतियों में विविधता को जरूरी जगह देने के बजाय उसका एक भ्रम खड़ा किया जा रहा है। ऐसी स्थिति में जिस जगह से वर्चस्व को तोड़ने की कोशिश होनी चाहिए थी, वहीं कमजोर तबकों की आवाज दब जाती है। समाचार चैनलों का इस तरह पक्षपातपूर्ण या कमाई के लोभ में बनता रुझान आखिरकार उनकी विश्वसनीयता को कमजोर बनाता है। ऐसे में मीडिया के भीतर से ही इस प्रवृत्ति को नियंत्रित करने की अपेक्षा स्वाभाविक ही एक बार फिर की जाने लगी है।

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