धमकी के सहारे

आचार संहिता के उल्लंघन की कुछ घटनाएं अमूमन हर चुनाव के दौरान देखने में आती हैं। लेकिन समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव और महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री अजित पवार ने वोट मांगने के लिए जैसी भयावह भाषा इस्तेमाल की है, वैसी दूसरी मिसाल मुश्किल से मिलेगी। कुछ दिन पहले मुलायम सिंह ने उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में एक चुनावी सभा को संबोधित करते हुए शिक्षा-मित्रों से कहा कि उनकी नौकरी पक्की तभी हो पाएगी जब वे समाजवादी पार्टी को वोट देंगे। आचार संहिता के तहत चुनाव के दौरान कोई लोकलुभावन घोषणा करने, मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए उन्हें कोई वित्तीय लाभ की पेशकश करने आदि पर रोक है। लेकिन मुलायम सिंह का बयान इस पाबंदी की अवहेलना भर नहीं है; वह मतदाताओं को सपा को वोट न देने पर खमियाजा भुगतने की चेतावनी भी है। उचित ही इस पर निर्वाचन आयोग ने उनसे जवाब तलब किया है। वहीं खबर है कि अजित पवार ने महाराष्ट्र के बारामती के एक गांव में चुनाव से ऐन पहले ग्रामीणों को संबोधित करते हुए कहा कि अगर उन्होंने सुप्रिया सुले को वोट नहीं दिया तो उनकी जलापूर्ति बंद करा दी जाएगी। पवार का यह बयान टीवी पर भी आ चुका है और आयोग फिलहाल संबंधित वीडियो की जांच कर रहा है। यह पहला मौका नहीं है जब अजित पवार ने किसानों के प्रति घोर संवेदनहीनता का परिचय दिया हो। एक बार वे अपने इस बयान के चलते विवाद में घिर गए थे कि अगर बांध में पानी नहीं है तो क्या वे उसे पेशाब से भर दें! तब भी उनकी चौतरफा आलोचना हुई थी। अब वोट के लिए वे धमकी देने पर उतर आए।

बारामती कृषिमंत्री शरद पवार का निर्वाचन क्षेत्र रहा है, जहां से उन्होंने लगातार कई चुनाव जीते हैं। इस बार वहां से उनकी बेटी सुप्रिया सुले उम्मीदवार हैं। महाराष्ट्र में कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस गठबंधन की सरकार है और शरद पवार के भतीजे अजित पवार उपमुख्यमंत्री हैं। पवार परिवार के पास सत्ता की इतनी ताकत होने


के बावजूद बारामती के ग्रामीण पानी के लिए तरस रहे हों, तो समझा जा सकता है कि पूरे राज्य की बात तो दूर, अपने गढ़ में भी उन्होंने कैसा विकास किया है! विकास की ऐसी विसंगति दूसरे नेताओं के भी निर्वाचन क्षेत्रों में मिल जाएगी। पर वोट न मिलने पर पानी से वंचित कर दिए जाने की धमकी एक विरल घटना है। यह आचार संहिता के उल्लंघन के साथ-साथ उससे भी ज्यादा गंभीर मामला है। यह अलग बात है कि वहां की पुलिस कोई कार्रवाई नहीं करना चाहती और सब कुछ निर्वाचन आयोग पर छोड़ देना चाहती है। धमकी की एक बानगी नेशनल कॉन्फ्रेंस के सदर फारूक अब्दुल्ला ने भी पेश की है। पिछले हफ्ते उन्होंने पीडीपी पर अपनी पार्टी के कई कार्यकर्ताओं की हत्या का आरोप मढ़ते हुए उसे सबक सिखाने की चेतावनी दी।

राजनीति में नीतियों और मुद्दों पर मतभेद और भ्रष्टाचार आदि को लेकर आरोप-प्रत्यारोप चलते रहते हैं। पर हमारे राजनीतिक अगर धमकी और हिंसा की भाषा बोलने लगें, तो सवाल सिर्फ चुनावी आचार संहिता का नहीं, यह भी है कि कानून के शासन का क्या होगा। फिर, चाहे मुलायम सिंह हो या अजित पवार या फारूक अब्दुल्ला, ये सत्तासीन हैं। इसलिए इनकी धमकियां और भी ज्यादा चिंताजनक हैं। पिछले दिनों आयोग ने अमित शाह और आजम खान को चुनाव प्रचार से अलग रहने का आदेश सुनाया था। आमतौर पर आयोग की कार्रवाई नोटिस देने और लिखित स्पष्टीकरण या जवाब पाने तक सीमित रहती है। इसलिए आयोग के नोटिसों को राजनीतिक लोग अमूमन ज्यादा तवज्जो नहीं देते; शायद वे सोचते हैं कि बात आई-गई हो जाएगी। यह विडंबना ही है कि जो लोग चुनाव से ही ताकत हासिल करते हैं, वे चुनाव की विश्वसनीयता की फिक्र नहीं करते!

​स्रोत-जनसता​

गलती

​गलतियों से जुदा,
वो भी नहीं हम भी नहीं।

दोनों इंसान हैं,
खुदा वो भी नहीं हम भी नहीं।

वो हमें और हम उसे,इल्ज़ाम देते हैं मगर,
अपने भीतर झाँकते,वो भी नहीं हम भी नहीं।

​गलतफहमियों ने कर दी, दोनों में पैदा दूरियाँ,
वरना फितरत के बुरे, वो भी नहीं हम भी नहीं​।

​इस घूमती ज़िंदगी में, दोनों का सफर जारी रहा,
एक लमहें को रुके, वो भी नहीं हम भी नहीं।

क्यों लाचार रहे मनमोहन सिंह?

पहले संजय बारू और फिर पीसी पारख। दोनों ऐसे वक्त अपनी किताबें लेकर आए हैं, जब देश आम चुनाव के दौर में है। दोनों किताबों से विपक्ष को यूपीए- खासकर कांग्रेस- पर हमला करने के लिए नए मसाले मिल गए हैं। या कम से कम यह तो जरूर हुआ है कि विपक्ष ने पहले से जिन बिंदुओं पर सत्ताधारी गठबंधन को कठघरे में खड़ा कर रखा था, उसे और वजन मिला है।

बारू प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के मीडिया सलाहकार थे और पारख कोयला सचिव। दोनों ने जो कहानी प्रस्तुत की है, उनका सार यह है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भले और ईमानदार व्यक्ति हैं, मगर स्वविवेक से निर्णय लेने की हैसियत में नहीं थे। इस रूप में उन्होंने अपमान झेला और प्रधानमंत्री पद की गरिमा की रक्षा करने में विफल रहे। पारख तब कोयला सचिव थे, जब कोयला खदानों के अनेक आवंटन हुए और बाद में उनमें अनियमितताओं और घोटाले के आरोप लगे। एक मामले में वे खुद सीबीआई जांच के घेरे में हैं।

उनके मुताबिक आवंटनों के क्रम में मनमोहन सिंह अपने मातहत मंत्रियों के दबाव में रहे और ऐसी सरकार का नेतृत्व करते रहे, जिसमें उनका कोई इख्तियार नहीं था। हालांकि, बारू के इस दावे का प्रधानमंत्री कार्यालय ने खंडन किया है कि सरकारी फाइलें कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को दिखाई जाती थीं, मगर उनकी किताब ने यह तस्वीर चित्रित की है कि सत्ता के असली सूत्र हमेशा सोनिया गांधी के हाथों में ही रहे।

पृष्ठभूमि यह है कि ये दोनों किताबें उन व्यक्तियों ने लिखी हैं, जिनके बारे में धारणा है कि वे अपने-अपने कारणों से यूपीए नेतृत्व से असंतुष्ट या खफा हो गए हैं। इसीलिए उनकी हर बात को सच मानने में अनेक लोगों को दिक्कत होगी। बहरहाल, दोनों किताबों की केंद्रीय कथावस्तु पर गौर करें तो यह अंदाजा जरूर लगता है कि अगर किन्हीं खास हालात में बनी व्यवस्था के तहत ऐसे व्यक्ति सर्वोच्च कुर्सी पर विराजमान हो जाएं, जिसके लिए जनादेश न हो, तो उसके वास्तविक प्राधिकार (अथॉरिटी) को लेकर संशय बना रहेगा। गठबंधन के मौजूदा दौर में किसी नेता को संपूर्ण प्राधिकार प्राप्त रहे, यह शायद मुमकिन नहीं है। मगर पद की गरिमा एवं गोपनीयता की शपथ अक्षुण्ण बनी रहें, यह सुनिश्चित करना जरूरी है।